Holi 2022 | Holi Festival | Holi Kyu Manai Jati Hain | होली का त्यौहार क्यों मनाया जाता है | मनाई जाती है? जाने होली की अनसुनी गाथा

By | अप्रैल 29, 2022
Holi Kyu Manai Jati Hain

हिंदू धर्म में सभी त्योहार अपने स्थान पर धार्मिक महत्व रखते हैं। आज हम बात कर रहे हैं होली की। होली (Holi) का त्योहार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस वर्ष होलिका दहन 17 मार्च गुरुवार को किया जाएगा तथा होली उत्सव 18 मार्च 2022 शुक्रवार के दिन मनाया जाएगा। होली दहन का महत्व बुराई पर अच्छाई की विजय को प्रतीक करता है। प्रभु के भक्तों पर आए कष्टों का निवारण होता है। होली से 8 दिन पहले होलाष्टक लग जाता है। फाल्गुन मास में रवि की फसल पक जाती है और किसानों के चेहरे खिल जाते हैं। (Holi Kyu Manai Jati Hain) इसी खुशी में होली का उत्सव बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाता है। लोग अपने मिलने वालो को होली पर श्यारी, होली कोट्स, होली निबंध, होली शुभकामनाएं सन्देश साझा करते हैं।

आइए जानते हैं, होली का त्यौहार क्यों मनाया जाता है? होली त्यौहार की कथा क्या है? होलिका दहन की कथा क्या है? होली क्यों मनाई जाती है? होली कब मनाई जाती है? धूलंडी क्यों मनाई जाती है? धूलंडी क्या होती है? होली पर धूलंडी क्यों मनाई जाती है? इन सभी सवालों के जवाब आप इस आर्टिकल में जानने वाले हैं। इसलिए अंत तक इस आर्टिकल को ध्यान पूर्वक जरूर पढ़ें।

HAPPY HOLI 2022

होली क्यों मनाई जाती है? | Holi Kyu Manai Jati Hain

Why is Holi celebrated:- हिंदू धार्मिक ग्रंथों के अनुसार होलिका दहन अर्थात होली त्यौहार मनाने की कथा पुरानी कथाओं से जुड़ी हुई है। सतयुग में  हिरण्यकश्यप नामक एक राजा थे। उन्होंने खुद को  इतना शक्तिशाली बना लिया था कि खुद को भगवान समझने लगे थे। पूरे राज्य में खुद को भगवान कहने का अधिकार जमाते थे। इस घमंड को दूर करने के लिए भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार धारण कर हिरण्यकश्यप का वध किया था। हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र भक्त पहलाद को मृत्युदंड देने हेतु अनेक उपाय किए थे। हिरण्यकश्यप की बहन  होलिका द्वारा प्रहलाद को गोद में लेकर जलाने की चेष्टा की गई थी। परंतु होलीका खुद जल गई। भक्त प्रहलाद बच गए। इसी मान्यता को लेकर आज भी होली का त्यौहार मनाया जाता है। होली का त्यौहार बुराई पर अच्छाई की विजय को साबित करता है। अधर्म पर धर्म की विजय करता है। नकारात्मक भावनाओं को सकारात्मक प्रभाव में ढालने की कोशिश करता है। अनेक विशेषताओं के साथ होली का त्यौहार मनाया जाता है। इसे रंगों का त्योहार भी कहा जाता है।

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होली दहन क्यों किया जाता है | Holi Dahan kyon Kiya Jata Hai 

होली दहन करने का मुख्य उद्देश्य बुराई पर अच्छाई की विजय साबित करना है।  अधर्म पर धर्म की विजय साबित करना है। हिंदू ग्रंथों के अनुसार जो भी त्योहार आज मनाए जा रहे हैं। उन सभी त्योहारों का अपने-अपने स्थान पर तथा समय अनुसार विशेष महत्व है। होलिका दहन फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। होलिका दहन को लेकर पौराणिक कथाओं में  हिरण्यकश्यप नामक राजा की बहन होलिका थी। जिसे ब्रह्मा जी से वरदान था कि उसका शरीर कभी भी आग नहीं जलेगा। चाहे वह अग्नि में क्यों ना बैठ जाए। उसके पास ऐसे दिव्य वस्त्र वरदान में प्राप्त था। इधर भक्त पहलाद भगवान विष्णु के परम भक्त थे और हिरण्यकश्यप के पुत्र थे। हिरण्यकश्यप को भक्त प्रहलाद द्वारा भगवान विष्णु को भेजना अच्छा नहीं लगता था। तो उन्होंने अपनी बहन को कहकर उन्हें जलाने की कोशिश की। परंतु भक्त पहलाद को भगवान विष्णु ने बचा लिया। होलिका को उसे प्राप्त वरदान का दुरुपयोग करने की सजा मिली। वह स्वयं जल गई और भक्त प्रहलाद बच गए।

इसीलिए जब प्रभु की कृपा होती है प्रभु के भक्तों को किसी प्रकार की बुराई आतताई तथा अधर्म ना जला सकता है ना मिटा सकता है। ना झुका सकता है। इसी संबंध में आज भी त्रेता युग, द्वापर युग तथा अंत में कलयुग में भी होलिका दहन किया जाता है।

होली के बाद धूलंडी क्यों मनाई जाती है | Why is Dhulandi celebrated after Holi

होली दहन के अगले दिन धूलंडी (Dhulandi) का त्यौहार मनाया जाता है। धूलंडी के दिन लोग आपस में एक दूसरे को रंग लगाते हैं। रंगों के त्यौहार को आनंद के साथ मनाते हैं। दरअसल धूलंडी मनाने के पीछे कुछ पुराने दंत कथाएं तथा मतभेदों से जुड़ी कुछ कथाएं हैं। कहा जाता है, द्वापर युग में भगवान विष्णु ने धुलीवंदन किया था। अर्थात धूल को आपस में प्रेम पूर्वक लगाने की प्रथा शुरू की थी। जिसे आज लोगों ने अलग-अलग रंगों के रूप में लगाना शुरू कर दिया। इसी प्रथा को होली के अगले दिन धूलंडी के रूप में मनाया जाता है। प्राचीन काल में धूलंडी मनाने का एकमात्र तरीका हुआ करता था, चिकनी तथा मुल्तानी मिट्टी को पूरे शरीर पर मला जाता था। जिससे शरीर की स्वच्छता बरकरार रहती थी।खुशबूदार मिट्टी का उपयोग किया जाता था। आज के समय में चिकनी और मुल्तानी मिट्टी की कमी होने की वजह से धीरे-धीरे लोग अलग-अलग रंग बिरंगे रंगों से धूलंडी त्यौहार को सेलिब्रेट करते हैं।

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होली कथा | Holi History | Holi History in Hindi

सतयुग में हिरण्यकश्यप नामक के एक राजा थे। राजा ने ब्रह्मा, शिव से कठिन घोर तपस्या कर अजर-अमर होने का वरदान मांगा था। हिरण्यकश्यप को ब्रह्माजी ने अजर-अमर होने का वरदान तो दे दिया परंतु उन्हें कहा कि ना तो आप दिन में मरोगे, ना शाम को मरोगे ना, अस्त्र से ना शस्त्र से, ना मानव से ना जानवर से, ना आकाश में ना पाताल में, ना अंदर ना बाहर आपके प्राणों को कोई आपसे छीन नहीं सकेगा। ऐसा वरदान हिरण्यकश्यप को ब्रह्माजी से प्राप्त हुआ। हिरण्यकश्यप राक्षस जाति से थे। तो उन्हें अपनी शक्तियों पर घमंड होने लगा।  वह खुद को भगवान समझने लगा। पूरी प्रजा में खुद को भगवान कहने का आदेश जारी कर दिया। हिरण्यकश्यप को भगवान विष्णु से अधिक घृणा थी। धीरे-धीरे समय बीतता चला गया। कुछ दिनों बाद हिरण्यकश्यप की पत्नी गर्भवती हुई। दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने अपनी दिव्य दृष्टि से पता किया कि जो महारानी के पेट में संतान पल रही है। वह विष्णु भक्त है और अभी से विष्णु का जाप कर रही है। यह बात जब हिरण्यकश्यप को पता चली, तो उसने रानी के गर्भ को गिराने के अनेक उपाय किए। परंतु सफल नहीं हो सके। कुछ दिनों बाद बालक का जन्म हो गया। बालक का बचपन से ही नाम प्रहलाद रखा गया। प्रहलाद भगवान विष्णु के भक्त थे और आठों पहर भगवान विष्णु का जाप किया करते थे। भक्त प्रहलाद का जाप करना उनके पिता हिरण्यकश्यप को अच्छा नहीं लगता था। तो उन्होंने भक्त प्रहलाद को प्राण दंड दे दिया। प्रह्लाद को अनेक तरीकों से मृत्यु तक पहुंचाने की कोशिश की गई। परंतु सभी उपाय असफल रहे।

कुछ दिनों बाद हिरण्यकश्यप की बहन होलिका ने प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर जलाने की बात हिरण्यकश्यप को बताई। होलिका को ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था की अग्नि में उसका शरीर नहीं जलेगा। इसी दिव्य शक्ति का होलिका ने गलत उपयोग करते हुए भक्त प्रहलाद को गोद में लेकर आग की चिता पर बैठ गई। भक्त प्रहलाद जैसे ही भगवान विष्णु का जाप करने लगे तो भक्त पहलाद को आंच भी नहीं आई। धीरे-धीरे होलिका का पूरा शरीर जल कर राख हो गया।

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भक्त पहलाद को कोई नहीं मिटा सका। कुछ दिनों बाद पहलाद ने अपने पिताश्री से कहा, कि आप भगवान विष्णु का ध्यान कीजिए। वह सर्वशक्तिमान है और हर कण-कण में निवास करते हैं। आपके भीतर मेरे भीतर, बाहर जहां पर भी हमारी दृष्टि नहीं जाती है। वहां पर भगवान विष्णु का वास है। यह बात हिरण्यकश्यप को बहुत ज्यादा चुभने लगी। हिरण्यकश्यप ने कहा क्या तेरे भगवान विष्णु इस खंभे में भी है? भक्त प्रहलाद ने कहा कि वह कण कण में है। तो अवश्य ही निश्चित तौर पर भगवान इस खंभे में भी है। हिरण्यकश्यप ने क्रोधित होकर उस खंभे को तोड़ने की चेष्टा की। जैसे ही खंबे को तोड़ा गया तो उसमें भगवान विष्णु नरसिंह  रूप में अवतरित हुए और उन्होंने हिरण्यकश्यप को ऐसे समय में मृत्यु के घाट उतार दिए जो ब्रह्माजी के दिए हुए वरदान से अलग थे।

भारतवर्ष में आज भी होलिका दहन इसी वजह से और इसी कथा को मानते हुए बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। होलिका दहन के समय भक्त पहलाद को बचाया जाता है। 

FAQ’s Holi Kyu Manai Jati Hain

Q. होली क्यों मनाई जाती है ?

Ans. होली का त्यौहार हिंदू धार्मिक ग्रंथों में हिरण्यकश्यप भक्त प्रहलाद और होलिका दहन की कथा पर आधारित है। होलिका दहन से भक्त प्रहलाद बच गए थे। इसका तात्पर्य है की बुराई पर हमेशा अच्छाई राज करती है। अधर्म पर हमेशा धर्मराज करता है। कभी भी धर्म-अधर्म से नहीं झुक सकता। इसी कथा को मानते हुए होली का त्यौहार मनाया जाता है।

Q. होली का त्यौहार क्यों मनाया जाता है?

Ans.  होली का त्यौहार बुराई पर अच्छाई की विजय को प्रतीत करता है। अधर्म पर धर्म की विजय स्थापित करता है। होली नामक राक्षसी का वध होना तथा भक्त प्रहलाद का बचना और भगवान विष्णु द्वारा भक्त पहलाद को हर समय हर व्याधि से बचाना। यह सभी कथाओं के आधार पर होली का त्यौहार मनाया जाता है।

Q.   होली के बाद धूलंडी क्यों मनाई जाती है?

Ans. फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होली का दहन किया जाता है तथा अगले दिन धूलंडी रंगों का त्योहार मनाया जाता है। धूलंडी के दिन आपसी भाईचारे एवं प्रेम प्रभाव को स्थापित करने हेतु रंगों का उपयोग किया जाता है। ताकि आपसी मेलजोल को बढ़ाया जा सके।

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